Friday, January 2, 2009

इन्तजार

नये वर्ष का इंतजार समाप्त हो गया। पुराना वर्ष समाप्त होते ही नये वर्ष के लिये कई सपने रहते हैं। कुछ करने की योजना रहती है, छात्रों की परीक्षा में तैयारी का, व्यापारियों को ब्यापारियों को व्यापार बढाकर अधिक लाभ कमाने का, किसानों को अधिक धान की कटनी, पिटनी एवं आने वाली रब्बी मसूर, चना की फ़सलों के अधिक उत्पादन की। राज्य के कर्मचारियों को सरकार द्वारा नयी नीतियों एवं लाभप्रद योजनाओं का इंतजार, मुख़्यमंत्री आवास में जाकर नव वर्ष के पकवान ख़ाने का इंतजार।
अणे मार्ग के दरवाजे ख़ुले तो लगा कि इस दरवाजे से कुछ आम अवाम, गरीबों, दलितों, अति पिछड़ों, अकलियतों, पसमांदा, छात्रों, ब्यापारियों, किसानों एवं कर्मचारियों के लिये कुछ निकलकर उक्त समुदाय में जायेंगे। यारपुर, राजाबाजार, एवं अन्य स्थानों पर रह रहे दलित जिन्हें आज महादलित कहा जा रहा है, पुलिस की गाड़ी आयेगी, अणे मार्ग में ले जायेगी। बचे लोगों को कहा जायेगा कि जल्द अणे मार्ग चले आयें, वहां जायेंगे कतार में बैठकर नये वर्ष की पकवान ख़ायेंगे और ठंढ से बचने के लिये कंबल भी मिलेंगे।
सारा दिन इन्तजार करता रहा बुलावे का, घोषणाओं का। इन्तजार में न सड़कों पर, न उद्यानों में, चौक चौराहों पर मन रहे नव वर्ष के जश्नों को भी नहीं देख़ पाया। बच्चे बार बार कहते रहे, पत्नी दबाव देती रही कि नव वर्ष में कहीं लुत्फ़ उठाने चलें, पर यहां तो इन्तजार था घोषणाओं का और बुलावे का।
फ़टे कपड़े, गेंदरा ओढे और पैर में चप्पल नहीं, कई दिन से स्नान नहीं करने के कारण माथे के केश में लट्टे बने थे। अणे मार्ग को देख़ा वहां की सूरत ही बदली हुई थी। अणे मार्ग जाने के दोनों रास्तों पर घेरा, मजबूत पुलिस की पहरेदारी, ऊंची दीवारें बना दी गयी थी। पुलिस की पैनी नजर थी। आंख़ें चढ रहे थे। आंख़ें बोल रही थीं कि यह कैसे आ गया। उनके मन की बातों को समझने में देर नहीं लगा, तुरत ही तय किया चलो, वरना प्रतिष्ठा जाने वाली है। भूख़े रहेंगे, ठंढ में बैठकर रात गुजार लेंगे लेकिन प्रतिष्ठा बचायेंगे।
डा0 निहोरा प्रसाद यादव